लाइब्रेरी बसें बाजारों, स्कूलों में पहुंचती हैं, हर रोज 600 बच्चे इनसे किताबें लेकर पढ़ते हैं

Mon, 25 Nov 2019 04:59:14 GMT

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अफगानिस्तान में सबसे कम साक्षर देश है, पढ़ने की आदत डालने की छाेटी सी काेशिश से बड़ा बदलाव

रोजाना दाे बसें काबुल के बाजाराें और स्कूल कैंपस तक पहुंचती हैं

ऑक्सफाेर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट फ्रेश्ता करीम बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का बीड़ा उठाया है

Dainik Bhaskar Nov 25, 2019, 10:29 AM IST

काबुल. मुसाफिराें काे मंजिल तक पहुंचाने वाली बसें आतंक पीड़ित अफगानिस्तान में बदलाव की वाहक बन गई हैं। रोजाना दाे बसें काबुल के बाजाराें और स्कूल कैंपस तक पहुंचती हैं। इनमें सवारियाें की बजाय किताबें हाेती हैं। ये किताबें नाैनिहालाें का जीवन बदल रही हैं। रोज करीब 600 बच्चे बस लाइब्रेरी में आते हैं। यह बीड़ा ऑक्सफाेर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट फ्रेश्ता करीम (27) ने उठाया है। फ्रेश्ता ने स्कूल-काॅलेज की पढ़ाई के दाैरान खुद किताबाें की कमी महसूस की थी।

इसलिए पढ़ाई पूरी हाेते ही वह चार्माग्ज नामक संस्था बनाने के लिए प्रेरित हुईं। फ्रेश्ता कहती हैं कि यूनेस्काे के आंकड़े बताते हैं कि अफगानिस्तान में साक्षरता दर दुनिया में सबसे कम है। यहां हर 10 में से केवल 3 वयस्क पढ़ पाने में सक्षम हैं। इसकी वजह भी दिखती है। काबुल के अधिकतर निजी स्कूलाें में लाइब्रेरी नहीं हैं। जाे हैं, उनमें बच्चाें के लिए किताबें नहीं हैं। बच्चाें तक किताबाें काे पहुंचाने का बसें कम खर्चीला और बेहतर तरीका है। संस्था ने एक सरकारी कंपनी से इन्हें किराए पर लिया। संगठन काे स्थानीय काराेबारियाें और समुदायाें से दान मिलता है। उसी से किताबें खरीदी जाती हैं।

तीसरी बस माेबाइल सिनेमा

संस्था तीसरी बस भी तैयार कर रही है, जाे माेबाइल सिनेमा की तरह काम करेगी। बसें ऐसे इलाकाें में नहीं ले जाई जातीं, जहां जानलेवा धमाके हाेना आम बात है। बच्चे लाइब्रेरी में पढ़ते हैं। एक-दूसरे से बात करते हैं और खेलते हैं। धीरे-धीरे उनमें पढ़ने की आदत बन रही है। फ्रेश्ता बताती हैं कि अक्सर बच्चे बहुत उत्साह में हाेते हैं। सबसे बड़ी चुनाैती यह है कि कई बच्चे एक साथ बस के भीतर आना चाहते हैं, लेकिन सब एक साथ बस के भीतर प्रवेश नहीं कर सकते।

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